श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  2.24.68 
অদ্বৈতের শ্রী-মুখের এ সকল কথাইহা
যে না মানযে সে দুষ্কৃতি সর্বথা
अद्वैतेर श्री-मुखेर ए सकल कथाइहा
ये ना मानये से दुष्कृति सर्वथा
 
 
अनुवाद
ये बातें अद्वैत के मुख कमल से निकली हैं। जो इन्हें स्वीकार नहीं करता, वह निश्चय ही दुराचारी है।
 
These words have come from the lotus mouth of Advaita. He who does not accept them is certainly a wicked person.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)