श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.24.33 
আর্তি করিঽ নাচযে অদ্বৈত মহাশয
পুনঃ পুনঃ দন্তে তৃণ করিযা পডয
आर्ति करिऽ नाचये अद्वैत महाशय
पुनः पुनः दन्ते तृण करिया पडय
 
 
अनुवाद
विलाप की उस मनोदशा में नृत्य करते हुए, अद्वैत महाशय ने अपने दांतों के बीच तिनका दबा लिया और बार-बार जमीन पर गिर पड़े।
 
Dancing in that mood of lamentation, Advaita Mahasaya held the straw between his teeth and fell on the ground again and again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)