विष्णु की भक्ति सेवा से रहित वैष्णव एक गैर-वैष्णव है। ऊष्मा से रहित वस्तु को "शीत" कहा जाता है। फिर भी भीषण ठंड में भी कुछ गर्मी होती है। इसलिए गर्मी और ठंड के बीच के भेद को न मानना विविधता की अनुपस्थिति का कारण बनता है। लेकिन विविधता या आनंद एक संवैधानिक विशेषता है। प्राकृतिक और अप्राकृतिक अवस्थाओं के बीच असंवैधानिक मंच से बराबरी और भेद करना दोनों ही दोषपूर्ण हैं। जब तक इन दो सांसारिक अवधारणाओं से रहित आध्यात्मिक बोध जाग्रत नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति की शुद्ध सेवा की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती है। जब तक किसी की सेवा प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती है, कोई न तो सर्वोच्च भगवान को महसूस कर सकता है और न ही भक्ति सेवा में स्थापित हो सकता है।
