श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 23: काजी को उद्धार करने वाले दिन नवद्वीप में भगवान का भ्रमण  »  श्लोक 525
 
 
श्लोक  2.23.525 
গৌরচন্দ্র-নিত্যানন্দ—শ্রী-রাম-লক্ষ্মণ
গৌরচন্দ্র—ঽকৃষ্ণঽ, নিত্যানন্দ—ঽসঙ্কর্ষণঽ
गौरचन्द्र-नित्यानन्द—श्री-राम-लक्ष्मण
गौरचन्द्र—ऽकृष्णऽ, नित्यानन्द—ऽसङ्कर्षणऽ
 
 
अनुवाद
गौरचंद्र और नित्यानंद श्री राम और लक्ष्मण हैं। गौरचंद्र कृष्ण हैं, और नित्यानंद संकर्षण हैं।
 
Gaurachandra and Nityananda are Sri Rama and Lakshmana. Gaurachandra is Krishna, and Nityananda is Sankarshana.
तात्पर्य
श्री गौरा और नित्यानंद श्री राम और लक्ष्मण हैं। श्री गौरा और नित्यानंद श्री कृष्ण-नारायण और संकर्षण हैं। भगवान चैतन्य की लीलाओं के विभिन्न धरातलों पर अवलोकन से यह समझ आती है कि श्री चैतन्य और नित्यानंद परम पूजनीय सत्य से भिन्न नहीं हैं। अपने विभिन्न अवतारों के माध्यम से, श्री नित्यानंद प्रभु निश्चित रूप से श्री चैतन्यदेव की सेवा करने में सक्षम हैं। जीव-शक्ति या जीवित संस्थाएं निश्चित रूप से श्री नित्यानंद प्रभु से ही उत्पन्न होती हैं। इसलिए सेवा का लक्षण प्रत्येक जीवित संस्था के लिए शाश्वत विशेषता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)