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श्लोक 2.23.520  |
কি বা জীব নিত্যানন্দ, কি বা ভক্ত জ্ঞানী
যার যেন মত ইচ্ছা না বোলযে কেনি |
कि वा जीव नित्यानन्द, कि वा भक्त ज्ञानी
यार येन मत इच्छा ना बोलये केनि |
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| अनुवाद |
| कोई नित्यानंद को जीवात्मा मान सकता है, कोई भक्त मान सकता है, कोई ज्ञानी मान सकता है। वे जो चाहें कह सकते हैं। |
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| Some may consider Nityananda to be a living entity, some a devotee, some a wise man. They can say whatever they want. |
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