श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 23: काजी को उद्धार करने वाले दिन नवद्वीप में भगवान का भ्रमण  »  श्लोक 277
 
 
श्लोक  2.23.277 
ত্রিভঙ্গ হৈযা, কভু দাণ্ডাইযা,
অঙ্গুলে মুরলী বাঽয
জিনিঽ মত্ত গজ, চলৈ সহজ,
দেখিঽ নযন জুডায
त्रिभङ्ग हैया, कभु दाण्डाइया,
अङ्गुले मुरली वाऽय
जिनिऽ मत्त गज, चलै सहज,
देखिऽ नयन जुडाय
 
 
अनुवाद
कभी-कभी वे त्रिमुखी होकर खड़े होकर अपनी उंगलियों से बांसुरी बजाने का नाटक करते थे। उनका उन्मत्त हाथी की तरह चलना सभी के नेत्रों को भाता था।
 
Sometimes he would stand three-faced and pretend to play the flute with his fingers. His gait like a frenzied elephant was a sight for all to see.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)