श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 23: काजी को उद्धार करने वाले दिन नवद्वीप में भगवान का भ्रमण  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.23.127 
অনন্ত ব্রহ্মাণ্ড মোর সেবকের দাস
মুঞি বিদ্যমানে ও কি ভযের প্রকাশ
अनन्त ब्रह्माण्ड मोर सेवकेर दास
मुञि विद्यमाने ओ कि भयेर प्रकाश
 
 
अनुवाद
"असंख्य ब्रह्माण्ड मेरे सेवकों के सेवक हैं। जब मैं स्वयं उपस्थित हूँ तो कौन सा भय प्रकट हो सकता है?
 
"The countless universes are servants of My servants. What fear can arise when I Myself am present?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)