श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  2.22.147 
অদ্বৈত-চরণে মোর এই নমস্কার
তান প্রিয তাহে মতি রহুক আমার
अद्वैत-चरणे मोर एइ नमस्कार
तान प्रिय ताहे मति रहुक आमार
 
 
अनुवाद
मैं अद्वैत के चरण कमलों में प्रार्थना करता हूँ कि मेरा मन उन पर स्थिर रहे जो उन्हें प्रिय हैं।
 
I pray at the lotus feet of Advaita that my mind may remain fixed on those who are dear to Him.
तात्पर्य
श्रील अध्वैत प्रभु के वास्तविक महिमामंडन करने वालों के कमल चरणों में मेरा मन स्थिर रहे। पापी शिष्यों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)