श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 118-119
 
 
श्लोक  2.22.118-119 
এ-কালে যে বৈষ্ণবের ঽবডঽ ঽছোটঽ বলে
নিশ্চিন্তে থাকুক, সে জানিবে কত কালে
জননীর লক্ষ্যে শিক্ষা-গুরু ভগবান্
বৈষ্ণবাপরাধ করাযেন সাবধান
ए-काले ये वैष्णवेर ऽबडऽ ऽछोटऽ बले
निश्चिन्ते थाकुक, से जानिबे कत काले
जननीर लक्ष्ये शिक्षा-गुरु भगवान्
वैष्णवापराध करायेन सावधान
 
 
अनुवाद
जो लोग कुछ वैष्णवों को श्रेष्ठ और कुछ को हीन समझते हैं, वे अभी चिंतामुक्त रहें, किन्तु समय आने पर उन्हें ज्ञान हो जाएगा। सबके मार्गदर्शक गुरु, भगवान ने अपनी माता का उदाहरण देकर सभी को वैष्णव-अपराध के विषय में सावधान किया था।
 
Those who consider some Vaishnavas superior and others inferior should be free from worry for now, but in time they will become enlightened. The Lord, the guiding Guru of all, warned everyone about the sins of Vaishnavaism by citing the example of His mother.
तात्पर्य
श्री गौरसुंदर की माता के द्वारा अद्वैत के श्री चरणों में किये गये अपराध(?) पर विचार करते हुए कुछ लोग भूल-वश अद्वैत प्रभु को "श्री कृष्ण" मान लेंगे और श्री नित्यानंद प्रभु की श्री अद्वैत प्रभु से तुलना करते हुए उनको हीन भाव में रखेंगे। उन्हें यह विचार करके, कि गौरसुंदर के किन दो दासियों में से श्रेष्ठ और किन में हीन हैं, मानसिक अटकल द्वारा विश्लेषण करने के कितने भयंकर परिणाम होते हैं, शीघ्र ही पता चल जाएगा। हालाँकि श्री गौरहरि ने अपनी माता को निमित्त बनाकर यह प्रकट किया कि अद्वैत प्रभु वैष्णवों में श्रेष्ठ है, पर उनका मुख्य उद्देश्य यह स्थापन करना और प्रचार करना था कि उनका अपना भक्त अद्वैत वैष्णव है, ताकि मूढ़ लोग उन्हें स्वयं भगवान कृष्ण, कृष्ण, ईश्वर के मूल व्यक्ति, के स्वरूप में न मान लें। श्री अद्वैत प्रभु के कुछ पापमय स्तोताओं की रक्षा के लिये, ताकि वे अद्वैत को "श्री कृष्ण" और श्री गौरसुंदर और श्री नित्यानंद को उनका अधीनस्थ न समझें, भगवान ने अद्वैत प्रभु को वैष्णव के रूप में स्थापित करने के लिये अपनी माता का अपराध क्षमा कर दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)