श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  2.22.106 
জগতে বিদিত নাম ঽশ্রী-শঙ্করারণ্যঽ
চলিলা অনন্ত-পথে বৈষ্ণবাগ্রগণ্য
जगते विदित नाम ऽश्री-शङ्करारण्यऽ
चलिला अनन्त-पथे वैष्णवाग्रगण्य
 
 
अनुवाद
इसके बाद वे सम्पूर्ण विश्व में श्रीशंकरारण्य के नाम से विख्यात हुए। भगवान कृष्ण की भक्ति के मार्ग पर चलते हुए, वे सर्वोच्च वैष्णव के रूप में विख्यात हुए।
 
Thereafter, he became known throughout the world as Sri Shankara. Following the path of devotion to Lord Krishna, he became renowned as a supreme Vaishnava.
तात्पर्य
द्वैत प्रभु के सानिध्य से श्री विश्वरूप घर त्यागकर भक्ति के मार्ग पर चल पड़े। उनके संन्यासी नाम शंकरारण्य था। इसलिए जब माता सची ने देखा कि द्वैत प्रभु के सानिध्य के कारण विश्वरूप ने घर छोड़ दिया, तो वह द्वैत प्रभु से नाराज हो गई। सचिदेवी ने सार्वजनिक रूप से द्वैत प्रभु के व्यवहार की आलोचना नहीं की, लेकिन फिर भी उन्होंने द्वैत का अपराध करने का पाश्चाताप किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)