श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  2.22.103 
নিরবধি বিশ্বরূপ অদ্বৈতের সঙ্গে
ছাডিযা সṁসার-সুখ গোঙাযেন রঙ্গে
निरवधि विश्वरूप अद्वैतेर सङ्गे
छाडिया सꣳसार-सुख गोङायेन रङ्गे
 
 
अनुवाद
विश्वरूप ने समस्त सांसारिक भोगों का परित्याग कर दिया और अद्वैत की संगति में आनन्दपूर्वक अपना समय व्यतीत किया।
 
Vishwarupa renounced all worldly pleasures and spent his time happily in the company of Advaita.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)