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श्लोक 2.21.25  |
ভাগবতে অচিন্ত্য-ঈশ্বর-বুদ্ধি যার
সে জানযে ভাগবত-অর্থ ভক্তি-সার |
भागवते अचिन्त्य-ईश्वर-बुद्धि यार
से जानये भागवत-अर्थ भक्ति-सार |
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| अनुवाद |
| जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत को अचिन्त्य परमेश्वर के रूप में स्वीकार करता है, वह जानता है कि शुद्ध भक्ति ही श्रीमद्भागवत का तात्पर्य है। |
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| One who accepts Srimad Bhagavatam as the inconceivable Supreme Being knows that pure devotion is the meaning of Srimad Bhagavatam. |
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