श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 21: भगवान द्वारा देवानंद को प्रताड़ना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.21.25 
ভাগবতে অচিন্ত্য-ঈশ্বর-বুদ্ধি যার
সে জানযে ভাগবত-অর্থ ভক্তি-সার
भागवते अचिन्त्य-ईश्वर-बुद्धि यार
से जानये भागवत-अर्थ भक्ति-सार
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत को अचिन्त्य परमेश्वर के रूप में स्वीकार करता है, वह जानता है कि शुद्ध भक्ति ही श्रीमद्भागवत का तात्पर्य है।
 
One who accepts Srimad Bhagavatam as the inconceivable Supreme Being knows that pure devotion is the meaning of Srimad Bhagavatam.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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