श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.20.145 
বাটোযারে সবে মাত্র এক জন্মে মারে
জন্মে জন্মে ক্ষণে ক্ষণে নিন্দকে সṁহরেঽ
बाटोयारे सबे मात्र एक जन्मे मारे
जन्मे जन्मे क्षणे क्षणे निन्दके सꣳहरेऽ
 
 
अनुवाद
चोर तो केवल एक ही जीवन में कष्ट भोगते हैं, किन्तु ईशनिंदा करने वाले तो जीवन-पर्यन्त कष्ट भोगते हैं।
 
Thieves suffer only in one life, but those who blaspheme suffer throughout their lives.
तात्पर्य
अपने कर्मों के फलस्वरूप, साधारण चोर अपनी पापी प्रतिक्रियाओं के समाप्त होने तक दुख भोगते हैं, लेकिन जो स्वाभाविक रूप से पापी होते हैं वे विष्णु और वैष्णवों की निंदा करने की उनकी प्रवृत्ति के कारण हमेशा के लिए दुख भोगने के पात्र होते हैं। सर्वोच्च भगवान और उनके भक्तों की लगातार निंदा करने की उनकी पापी प्रवृत्ति उन्हें असीमित पीड़ा का कारण बनती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)