श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.20.130 
সুকৃতি মুরারি কান্দে ধরিযা চরণ
গুপ্ত কোলে করিঽ কান্দে শ্রী-শচীনন্দন
सुकृति मुरारि कान्दे धरिया चरण
गुप्त कोले करिऽ कान्दे श्री-शचीनन्दन
 
 
अनुवाद
धर्मात्मा मुरारी भगवान के चरणकमलों को पकड़कर रो पड़े, और श्री शचीनंदन भी रो पड़े जब उन्होंने मुरारी को उठाकर गले लगा लिया।
 
The virtuous Murari wept holding the Lord's lotus feet, and Sri Sachinandan also wept when he picked up Murari and embraced him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)