श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.19.53 
ধন-বর দিল আমি পরম সন্তোষে
কোথা গেল উপকার, আরো আমাঽ দোষে!”
धन-वर दिल आमि परम सन्तोषे
कोथा गेल उपकार, आरो आमाऽ दोषे!”
 
 
अनुवाद
"मैंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें धन का वरदान दिया, और उसकी सराहना तो दूर, उन्होंने मुझमें दोष ही निकाल दिया!"
 
"I gladly gave them the boon of wealth, and far from appreciating it, they found fault with me!"
तात्पर्य
"मैंने इस ब्राह्मण-पुत्र को प्रसन्न होके यह आशीर्वाद दिया, 'धनवान रहो', पर वह कृतज्ञता की बजाए मुझे दोष देने लगा। यह निश्चय ही कलियुग का काम है!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)