श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.19.49 
প্রভু বলে,—“গোসাঞি এ নহে আশীর্বাদ”
হেন বল—“তোরে হৌ কৃষ্ণের প্রসাদ
प्रभु बले,—“गोसाञि ए नहे आशीर्वाद”
हेन बल—“तोरे हौ कृष्णेर प्रसाद
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "हे गोसांई, यह कोई आशीर्वाद नहीं है। बल्कि तुम्हें कहना चाहिए, 'कृष्ण की कृपा तुम्हें प्राप्त हो।'
 
The Lord said, "O Gosain, this is not a blessing. Rather you should say, 'May you receive the blessings of Krishna.'
तात्पर्य
गौरांग के अत्यंत आसक्त गृहस्थ उपासक स्वर्गीय श्री नंदीजी के वर्तमान युग के अनुयायी इस दारी सन्यासी मत का समर्थन करते हैं। दारी सन्यासियों की "वरदान" की अवधारणा सुंदर पत्नी पाना, गरीबों का शोषण करने के लिए धन, भौतिक शिक्षा, और निष्ठाहीन को प्रभावित करने हेतु अपनी वंशानुगत जाति की प्रतिष्ठा बनाए रखने की प्यास है । श्री गौरसुंदर ने ऐसे अत्यंत आसक्त गृहस्थ "बाबा ठाकुरों" की धारणाओं को स्वीकार नहीं किया और दारी सन्यासी के वरदानों में दोष बताए। चूंकि कामुक लोग इच्छाहीन परमहंस वैष्णवों की मानसिकता को समझ नहीं सकते, इसलिए वे वैष्णवों को अपने जैसा ही समझते हैं। दारी सन्यासियों ने धीरे-धीरे जाति गोस्वामियों के दर्शन को अपना लिया है। श्रीमान महाप्रभु ने जाति गोस्वामियों के दर्शन को बिल्कुल स्वीकार नहीं किया है। बल्कि, उन्होंने स्थापित किया कि विवाहित गोस्वामियों को सिखाने के लिए कृष्ण की दया सर्वोच्च आशीर्वाद है। भौतिक आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करने वाले लोग ऐसी गतिविधियों का अत्यधिक सम्मान करते हैं जो विष्णु की भक्ति से रहित हैं और उनकी वासना को पूरा करती हैं। उस स्थिति में वे निष्काम परमहंस भागवत-धर्म, परम भगवान की निःस्वार्थ शुद्ध भक्ति सेवा के सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, और उन्हें स्मार्तों द्वारा बनाई गई गैर-वैष्णवता को वैष्णवता मानते हैं। जाति गोस्वामी और दारी सन्यासी इस दुनिया के लोगों से "गोसाँई" की उपाधि प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं। सन्यासी को सम्मान देने के बहाने महाप्रभु ने सन्यासी को "गोसाँई" भी कहा। वास्तव में वे कभी गोस्वामी नहीं बन सकते। श्री चैतन्यदेव की मानसिकता पहले ही श्रीमद् भागवतम् (7.5.30) अधंत-गोभिर विसतां तमिस्रं और श्री रूप गोस्वामी के वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं जैसे श्लोकों में प्रकट की जा चुकी है। [मतिर न कृष्णे परतः स्वतो वाmitho 'bhipadyeta gṛha-vratānām adānta-gobhir viśatāṁ tamisraṁpunaḥ punaś carvita-carvaṇānām, “अपनी बेकाबू इंद्रियों के कारण, भौतिकवादी जीवन के बहुत आदी लोग नारकीय परिस्थितियों की ओर प्रगति करते हैं और बार-बार वही चबाते हैं जो पहले ही चबाया जा चुका है। कृष्ण के प्रति उनका झुकाव कभी भी जागृत नहीं होता है, चाहे दूसरों के निर्देशों से, अपने स्वयं के प्रयासों से, या दोनों के संयोजन से। वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगंjihvā-vegam udaropastha-vegam, etān vegān yo viṣaheta dhīraḥsarvām apīmāṁ pṛthivīṁ sa śiṣyāt, “एक शांत व्यक्ति जो बोलने की इच्छा, मन की मांगों, क्रोध की क्रियाओं और जीभ की इच्छाओं, पेट और जननांगों को सहन कर सकता है, वह पूरी दुनिया में शिष्य बनाने के योग्य है।]
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)