श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.19.38 
বেদে নারে নিশ্চাইতে যে প্রভুর রূপ
তাহাতে যে দেব মোহেঽ, এ নহে কৌতুক
वेदे नारे निश्चाइते ये प्रभुर रूप
ताहाते ये देव मोहेऽ, ए नहे कौतुक
 
 
अनुवाद
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि देवतागण भगवान के उस रूप से मोहित हो गए थे, जिसे वेद भी प्रमाणित नहीं कर सकते।
 
It was no surprise that the gods were fascinated by that form of God which even the Vedas could not prove.
तात्पर्य
हिंदी पाठ्य:

श्रीमद् भागवतम् (१.१.१) में यह वर्णित है:

तेने ब्रह्म हृदा या आदि-कवये मुह्यन्ति यत् सूरयः

तेजो-वारि-मृदां यथा विनिमयो यत्र त्रि-सर्गो 'मृषा

"वह केवल वही है जिन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान का संचार किया, जो मूल जीवित प्राणी हैं। उनके द्वारा भी महान ऋषि और देवता भ्रम में पड़ जाते हैं, जैसे कि आग में देखे गए पानी के भ्रामक प्रतिनिधित्व से या पानी पर देखी गई जमीन से कोई भ्रमित हो जाता है। केवल उन्हीं के कारण भौतिक ब्रह्मांड, प्रकृति के तीनों प्रकारों की प्रतिक्रियाओं से अस्थायी रूप से प्रकट होते हैं, तथ्यात्मक प्रतीत होते हैं, हालांकि वे अवास्तविक हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)