श्रीमद् भागवतम् (१.१.१) में यह वर्णित है:
तेने ब्रह्म हृदा या आदि-कवये मुह्यन्ति यत् सूरयः
तेजो-वारि-मृदां यथा विनिमयो यत्र त्रि-सर्गो 'मृषा
"वह केवल वही है जिन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान का संचार किया, जो मूल जीवित प्राणी हैं। उनके द्वारा भी महान ऋषि और देवता भ्रम में पड़ जाते हैं, जैसे कि आग में देखे गए पानी के भ्रामक प्रतिनिधित्व से या पानी पर देखी गई जमीन से कोई भ्रमित हो जाता है। केवल उन्हीं के कारण भौतिक ब्रह्मांड, प्रकृति के तीनों प्रकारों की प्रतिक्रियाओं से अस्थायी रूप से प्रकट होते हैं, तथ्यात्मक प्रतीत होते हैं, हालांकि वे अवास्तविक हैं।"
