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श्लोक 2.19.244  |
দেখিযা অদ্বৈত ক্রোধে অগ্নি-হেন জ্বলে
নিত্যানন্দ-তত্ত্ব কহে ক্রোধাবেশ-ছলে |
देखिया अद्वैत क्रोधे अग्नि-हेन ज्वले
नित्यानन्द-तत्त्व कहे क्रोधावेश-छले |
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| अनुवाद |
| यह देखकर अद्वैत क्रोध से आग की तरह जलने लगा। क्रोध के बहाने उन्होंने नित्यानंद की महिमा का वर्णन करना आरम्भ किया। |
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| Seeing this, Advaita burned with anger. Under the guise of anger, he began to describe the glories of Nityananda. |
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