श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.19.195 
তুমি মোর প্রাণ-নাথ, তুমি মোর ধন
তুমি মোর পিতা-মাতা, তুমি বন্ধু-জন
तुमि मोर प्राण-नाथ, तुमि मोर धन
तुमि मोर पिता-माता, तुमि बन्धु-जन
 
 
अनुवाद
"तुम मेरे जीवन के स्वामी हो, और तुम ही मेरी संपत्ति हो। तुम मेरे पिता और माता हो, और तुम मेरे प्रिय मित्र हो।
 
“You are the master of my life, and you are my only wealth. You are my father and mother, and you are my dear friend.
तात्पर्य
बहुत से लोग ग़लत तरीके से श्री गौरासुंदर को एक सामान्य माता, सामान्य पिता, सामान्य मित्र या इसी तरह के सामान्य संबंध के रूप में मानते हैं, लेकिन अद्वैत प्रभु ने गौरासुंदर को सभी सांसारिक पदनामों से पूर्ण रूप से परे माना और उन्हें ट्रान्सेंडेंटल पिता, माता, धन और प्रिय के रूप में स्थापित किया। भौतिक रिश्ते अप्रिय भौतिक आनंद के मंच पर आधारित होते हैं; उनमें सेवा के रवैये का कोई निशान नहीं होता है। प्रकृत-सहजिया का प्रेमी के रूप में मूड, संपन्न प्रकृत-सहजिया का धन और प्रकृत-सहजिया का मित्र, पिता, माता और पुत्र के रूप में संबंध सभी भौतिक आनंद के वातावरण में स्थित हैं। भौतिक आनंद से मुक्त होने के लिए वे त्याग के माहौल में शून्यवाद का सहारा लेते हैं और इस प्रकार अवैयक्तिकवादी बन जाते हैं। लेकिन जो लोग समझते हैं कि इस भौतिक दुनिया की सभी वस्तुएँ भगवान विष्णु से संबंधित हैं, वे आनंद और कामुक ज्ञान की भावना से हमेशा दूर रह सकते हैं। वैष्णव दर्शन में भौतिक आनंद की कोई भावना नहीं है और ऐसी कोई अवधारणा नहीं है कि दृश्यमान वस्तुएँ "आनंददायक" हैं; आनंद के रवैये के बजाय सेवा का रवैया प्रमुख है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)