श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  2.19.122 
তর্জে গর্জে মহাপ্রভু, গঙ্গা-স্রোতে ভাসে
মৌন হৈঽ নিত্যানন্দ মনে মনে হাসে
तर्जे गर्जे महाप्रभु, गङ्गा-स्रोते भासे
मौन हैऽ नित्यानन्द मने मने हासे
 
 
अनुवाद
जब महाप्रभु गंगा की धारा में बहते हुए गरज रहे थे और धमकी दे रहे थे, तब नित्यानंद चुप रहे और मन ही मन मुस्कुरा रहे थे।
 
While Mahaprabhu roared and threatened as he flowed down the Ganges, Nityananda remained silent and smiled to himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)