श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.19.112 
কাশীতে যে পর নিন্দে, সে শিবের দণ্ড্য
শিব-অপরাধে বিষ্ণু নহে তার বন্দ্য
काशीते ये पर निन्दे, से शिवेर दण्ड्य
शिव-अपराधे विष्णु नहे तार वन्द्य
 
 
अनुवाद
जो लोग काशी में दूसरों की निन्दा करते हैं, उन्हें भगवान शिव दण्डित करते हैं और जो लोग शिव को अपमानित करते हैं, वे भगवान विष्णु के भक्त नहीं बन सकते।
 
Those who criticize others in Kashi are punished by Lord Shiva and those who insult Shiva cannot become devotees of Lord Vishnu.
तात्पर्य
काशी के स्वामी महादेव, काशी के निवासियों को दंडित करते हैं जो परम सत्ता का अपमान करते हैं। श्रेष्ठ वैष्णव-महादेव इन निंदनीय प्राणियों को वैष्णवों के अपराध के लिए दंडित करते हैं और विष्णु की भक्ति से वंचित कर देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)