श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.18.215 
ইহা না বুঝিযা কোন কোন পাপী জনা
প্রভুরে বলযে ঽগোপীঽ খাইযা আপনা
इहा ना बुझिया कोन कोन पापी जना
प्रभुरे बलये ऽगोपीऽ खाइया आपना
 
 
अनुवाद
इस तथ्य को समझे बिना ही कुछ पापी व्यक्तियों ने भगवान को गोपी कहकर अपना नाश कर लिया।
 
Without understanding this fact, some sinful people destroyed themselves by calling God Gopi.
तात्पर्य
परम प्रभु आराधना के लक्ष्य हैं। यदि उन्हें आश्रय-विग्रह, या भक्त, के रूप में देखा जाता है और उन्हें गोपी के रूप में वर्णित किया जाता है, तो प्रभु को ऊर्जावान के बजाय केवल एक ऊर्जा के रूप में देखा जाएगा। मायावादी और भक्तिपरक भगवान गौरासुंदर को सभी विष्णु-तत्वों के स्रोत के रूप में नहीं समझ सकते हैं। आश्रय के लिए उपयुक्त लीलाओं का प्रदर्शन विसय-विग्रह द्वारा किया जाता है, या सभी भक्तों का आश्रय दुर्भाग्यपूर्ण लोगों को सत्य का एहसास करने में बाधा डालता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)