श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 17: नवद्वीप में भगवान का भ्रमण और भक्तों की महिमा का वर्णन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.17.62 
যে নারিলা লুকাইতে ক্ষীর-সিন্ধু-মাঝে
সে কেমনে লুকাইব বাহির-সমাজে?”
ये नारिला लुकाइते क्षीर-सिन्धु-माझे
से केमने लुकाइब बाहिर-समाजे?”
 
 
अनुवाद
“जो व्यक्ति क्षीरसागर में नहीं छिप सका, वह खुले समाज में कैसे छिप सकता है?”
 
“How can a person who could not hide in the ocean of milk hide in an open society?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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