श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 17: नवद्वीप में भगवान का भ्रमण और भक्तों की महिमा का वर्णन  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  2.17.106 
আগে হয মুক্তি, তবে সর্ব-বন্ধ-নাশ
তবে সে হৈতে পারে শ্রী-কৃষ্ণের দাস
आगे हय मुक्ति, तबे सर्व-बन्ध-नाश
तबे से हैते पारे श्री-कृष्णेर दास
 
 
अनुवाद
पहले मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है, फिर उसके भौतिक बंधन नष्ट हो जाते हैं, तब वह भगवान कृष्ण का सेवक बन सकता है।
 
First a man attains salvation, then his material bonds are destroyed, then he can become a servant of Lord Krishna.
तात्पर्य
जब तक कोई भौतिक ज्ञान के चंगुल से मुक्ति नहीं पाता है, तब वह ध्वनि कंपनों की विद्या के रहस्य को नहीं समझ सकता है। ऐसी स्थिति में, वह सेवा करने में असमर्थ होता है। परम भगवान के सेवक भक्त तभी मुक्त हो पाते हैं जब वे भौतिक सुख भोगने की इच्छा से रिटायर हो जाते हैं। मुक्त होने के बाद, शांता-भक्त दास्या मंच को प्राप्त करने की एक तीव्र इच्छा विकसित करते हैं। जो लोग पदार्थ के सेवक हैं, वे सोचते हैं कि मुक्त आत्माओं का सेवा भाव भौतिक दुनिया की घृणा के भीतर ही सीमित है। इसके बाद, वे पूरी तरह से अस्थायी इच्छाओं की रस्सियों से बंध जाते हैं। शुद्ध आत्मा का शाश्वत स्वभाव, जो कि भौतिक विचारों के अनुसार सभी पदनामों से मुक्त है, भगवान की सेवा करना है। इस संबंध में कृष्ण-करनामृत छंद पर चर्चा करनी चाहिए: भक्तिस त्वयी स्थिरतरा [भक्तिस त्वयी स्थिरतरा भगवन यदि स्याद्, दैवेन नः फलति दिव्य-किशोर-मूर्तिमुक्तिः स्वयं मुकुलितांजलि सेवतेऽस्मान्, धर्माथ-काम-गतायाः समया-प्रतीक्षाः "अगर मैं आपकी भक्ति सेवा में लगा हूँ, मेरे प्रिय भगवान, तो मैं आपकी उपस्थिति को हर जगह आसानी से देख ले सकता हूँ। और जहाँ तक मुक्ति का सवाल है, मुझे लगता है कि मुक्ति मुड़े हाथों के साथ मेरे दरवाजे पर खड़ी है, मेरी सेवा करने के लिए इंतज़ार कर रही है—और धर्म [धार्मिकता], अर्थ [आर्थिक विकास] और काम [इंद्रिय तृप्ति] की सभी भौतिक सुविधाएँ उसके साथ आई हैं।" (कृष्ण-करनामृत 107)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)