श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.16.54 
প্রভু কহে,—“চিত্তে কেন না বাসোঙ্ প্রকাশ?
কার অপরাধে মোর না হয উল্লাস?
प्रभु कहे,—“चित्ते केन ना वासोङ् प्रकाश?
कार अपराधे मोर ना हय उल्लास?
 
 
अनुवाद
प्रभु बोले, "मैं प्रभु को अपने हृदय में क्यों नहीं बसा पा रहा हूँ? मैंने किसका अपमान किया है कि मैं सुखी नहीं हूँ?"
 
The Lord said, "Why am I unable to make the Lord reside in my heart? Whom have I offended that I am not happy?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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