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श्लोक 2.16.30  |
অচিন্ত্য গৌরাঙ্গ-তত্ত্ব বুঝন না যায
সেই-ক্ষণে ধরে সর্ব-বৈষ্ণবের পায |
अचिन्त्य गौराङ्ग-तत्त्व बुझन ना याय
सेइ-क्षणे धरे सर्व-वैष्णवेर पाय |
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| अनुवाद |
| गौरांग के बारे में अकल्पनीय सत्य को कोई नहीं समझ सकता, जो अगले ही क्षण वैष्णवों के पैर पकड़ लेगा। |
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| No one can understand the unimaginable truth about Gauranga, who will hold the feet of Vaishnavas in the next moment. |
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