श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 13: जगाई और माधाई का उद्धार  »  श्लोक 347
 
 
श्लोक  2.13.347 
নিত্যানন্দ বলে,—“মুখে নাহি বাস লাজ
হারিলে আপনে—আর কন্দলে কি কাজ?”
नित्यानन्द बले,—“मुखे नाहि वास लाज
हारिले आपने—आर कन्दले कि काज?”
 
 
अनुवाद
नित्यानंद ने उत्तर दिया, "क्या आपको ऐसा कहते हुए शर्म नहीं आती? आप तो हार चुके हैं, इसलिए झगड़ा करने से क्या लाभ?"
 
Nityananda replied, "Aren't you ashamed to say this? You have already lost, so what's the point in fighting?"
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