श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 11: नित्यानंद का चरित  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.11.26 
যাঽর বাহ্য নাহি, তাঽর বচনে কি লাজ?
নিত্যানন্দ ভাসযে আনন্দ-সিন্ধু-মাঝ
याऽर बाह्य नाहि, ताऽर वचने कि लाज?
नित्यानन्द भासये आनन्द-सिन्धु-माझ
 
 
अनुवाद
क्या किसी के शब्द उस व्यक्ति को शर्मिंदा कर सकते हैं जिसने अपनी बाह्य चेतना खो दी हो? नित्यानंद परमानंद के सागर में तैर रहे थे।
 
Can anyone's words embarrass a person who has lost his outer consciousness? Nityananda was floating in an ocean of bliss.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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