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श्लोक 2.11.26  |
যাঽর বাহ্য নাহি, তাঽর বচনে কি লাজ?
নিত্যানন্দ ভাসযে আনন্দ-সিন্ধু-মাঝ |
याऽर बाह्य नाहि, ताऽर वचने कि लाज?
नित्यानन्द भासये आनन्द-सिन्धु-माझ |
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| अनुवाद |
| क्या किसी के शब्द उस व्यक्ति को शर्मिंदा कर सकते हैं जिसने अपनी बाह्य चेतना खो दी हो? नित्यानंद परमानंद के सागर में तैर रहे थे। |
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| Can anyone's words embarrass a person who has lost his outer consciousness? Nityananda was floating in an ocean of bliss. |
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