श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 303
 
 
श्लोक  2.10.303 
তাহান কৃপায হয চৈতন্যেতে রতি
নিত্যানন্দ ভজিলে আপদ্ নাহি কতি
ताहान कृपाय हय चैतन्येते रति
नित्यानन्द भजिले आपद् नाहि कति
 
 
अनुवाद
उनकी कृपा से मनुष्य को भगवान चैतन्य के प्रति आसक्ति प्राप्त होती है। भगवान नित्यानंद की पूजा मात्र से मनुष्य को कहीं भी संकट का सामना नहीं करना पड़ता।
 
By his grace, one attains attachment to Lord Chaitanya. Simply worshipping Lord Nityananda frees one from troubles anywhere.
तात्पर्य
कति शब्द का अर्थ है "कहीं भी"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)