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श्लोक 2.10.274  |
কেহ কেহ পরিগ্রহ কিছু নাহি লয
বৃথা আকুমার-ধর্মে শরীর শোষয |
केह केह परिग्रह किछु नाहि लय
वृथा आकुमार-धर्मे शरीर शोषय |
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| अनुवाद |
| उनमें से कुछ ने दूसरों से कुछ भी न लेने की कसम खा ली और व्यर्थ ही ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपने शरीर को कुम्हला लिया। |
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| Some of them vowed not to take anything from others and wasted their bodies by observing celibacy in vain. |
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