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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन
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श्लोक 153
श्लोक
2.10.153
যাহার প্রসাদে অদ্বৈতের সর্ব-সিদ্ধি
হেন চৈতন্যের কিছু না জানযে শুদ্ধি
याहार प्रसादे अद्वैतेर सर्व-सिद्धि
हेन चैतन्येर किछु ना जानये शुद्धि
अनुवाद
ऐसा व्यक्ति भगवान चैतन्य की महिमा को नहीं जानता, जिनकी कृपा से अद्वैत को पूर्णता प्राप्त होती है।
Such a person does not know the glory of Lord Chaitanya, by whose grace non-duality attains perfection.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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