श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  2.10.139 
বেদে যেন নানা-মত করযে কথন
এই-মত আচার্যের দুর্জ্ঞেয বচন
वेदे येन नाना-मत करये कथन
एइ-मत आचार्येर दुर्ज्ञेय वचन
 
 
अनुवाद
चूँकि वेदों में विभिन्न मत हैं, इसलिए अद्वैत आचार्य के कथनों को समझना बहुत कठिन है।
 
Since there are different opinions in the Vedas, it is very difficult to understand the statements of Advaita Acharya.
तात्पर्य
सो कॉल्ड वंशज चूँकि अध्‍वैत आचार्य के समझ नहीं पाये, उनके अभिप्राय की व्याख्या उन्होंने इस प्रकार संसार के लोगों को बताया जो भक्ति सेवा की दृष्टि से प्रतिकूल होने पर भी भक्‍तों को ग्रहण करने चाहिए, इसीलिये बँगला-असम प्रदेश के कुछ भागों में 'पंचोपासना' प्रमुख बन गई। ठाकुर वृंदावनदास जी ने कहा भी है - वेद-साहित्‍य के भिन्‍न भिन्‍न वचनों को ऊपर से देखने वाले परस्‍पर में विरोधी देखते हैं। फलस्‍वरूप केवलाद्वैत, शुद्धाद्वैत के अतिरिक्‍त 'द्वैताद्वैत' नामक प्रत्‍यैक सिद्धांत हो गया। अध्‍वैत आचार्य के कथन और चरित्र की जिज्ञासा मानने वाले लोग प्राय: अध्‍वैत आचार्य के अमुक मत को बतलाते हैं। जबकि श्री अध्‍वैत प्रभु ने श्री चैन्‍न्‍यदेव के सिध्‍दांत पर ही संसार को उपदेश किया है। यद्यपि उनके कथन विरोधी प्रतीत होते हैं, तथापि उनका कथन श्री चैन्‍न्‍यदेव के सिध्‍दांत के अनुकूल है, 'प्रमाणित' भी है। यद्यपि श्री चैन्‍न्‍य देव का कथन अचिंत्‍य अभेद भाव का समर्थन करता है, तथापि भेदभाव की भी पुष्टि करता है। इसलिये ये भौतिक विचार के विषय नहीं हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)