श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.10.130 
আজি তোরে সত্য কহি ছাডিযা কপট
ঽসর্বত্র পাণি-পাদṁ তত্ঽ—এই সত্য পাঠ
आजि तोरे सत्य कहि छाडिया कपट
ऽसर्वत्र पाणि-पादꣳ तत्ऽ—एइ सत्य पाठ
 
 
अनुवाद
“आज मैं बिना किसी दिखावे के आपसे कहता हूँ कि इस श्लोक का वास्तविक अर्थ है सर्वत्र पाणिपादं तत्।
 
“Today I tell you without any pretense that the real meaning of this verse is sarvatra panipadam tat.
तात्पर्य
श्वेताश्वतर उपनिषद (3.16) पर अवश्य ही चर्चा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)