श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 407
 
 
श्लोक  2.1.407 
“(হরে) হরযে নমঃ কৃষ্ণ যাদবায
নমঃগোপাল গোবিন্দ রাম শ্রী-মধুসূদন”
“(हरे) हरये नमः कृष्ण यादवाय
नमःगोपाल गोविन्द राम श्री-मधुसूदन”
 
 
अनुवाद
"हे भगवान हरि, हे भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं, जिन्हें हरि, यादव, गोपाल, गोविंद, राम, श्री मधुसूदन के नाम से जाना जाता है।"
 
"O Lord Hari, O Lord Krishna, I salute You, who are known as Hari, Yadava, Gopala, Govinda, Rama, Sri Madhusudan."
तात्पर्य
इस प्रसंग में, हरि और यादव नामों के चौथे कारक का प्रयोग शरणागति या आत्मा-समर्पण (समर्पण) को इंगित करने के लिए किया गया है। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति जो कृष्ण के पवित्र नामों का जाप करने का इच्छुक है, उसे पहले एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के चरणों में पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करके पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जिसका एकमात्र संकल्प कृष्ण के पवित्र नामों का जाप करना है; उसे लगातार आध्यात्मिक गुरु और वैष्णवों के मुख से कृष्ण के विषयों और पवित्र नामों को सुनने में लगा रहना चाहिए; और उसे बिना किसी अपराध के कृष्ण के पवित्र नामों को ज़ोर-ज़ोर से पुकारना चाहिए और हमेशा जप करना चाहिए।

यदि कोई परमेश्वर के पवित्र नामों के चौथे या मूल कारक का प्रयोग करके पूर्ण समर्पण और बिना छल-कपट के जप करना चाहता है, तो वह मंत्र का जाप कर रहा है; और यदि कोई भगवान के पवित्र नामों को संबोधन के रूप में, मूल कारक का उपयोग करके जपता है [जैसे कि हरे कृष्ण महा-मंत्र में], तो वह पवित्र नामों के भजन, या उपासना में लगा हुआ है। पवित्र नामों का उनके चौथे कारक में जप पूर्ण समर्पण को इंगित करता है, जबकि पवित्र नामों को संबोधन के रूप में जप करने पर अनन्त सेवा की इच्छा का संकेत मिलता है। एक दीक्षित व्यक्ति मंत्र का जाप करके भौतिक अस्तित्व के बंधन से मुक्त हो जाता है, और एक मुक्त आत्मा पवित्र नामों को संबोधन के रूप में जप करके अपने अनन्त भजन का प्रदर्शन करता है। कृष्ण-मंत्र को साधना और कृष्ण-नाम को साधना और साध्य दोनों के रूप में स्वीकार करने से, साध्य और साधना दोनों को एक-दूसरे से भिन्न न मानकर भक्ति सेवा की आसन्न श्रेणियों के रूप में स्वीकार किया जाता है। मंत्र और नाम दोनों ही स्वयं विष्णु से भिन्न नहीं हैं। मंत्र का जाप करने का अभ्यास भगवान के साथ अपने संबंध के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए है, और जब कोई मंत्रों का जाप करने में पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तो उस मुक्त आत्मा का भजन शुरू होता है। चैतन्य-चरितामृत में (आदि 7.73) कहा गया है:

कृष्ण-मंत्र हाइटे हबे संसार-मोचन

कृष्ण-नामा हाइटे पाबे कृष्णेरा चरण

“केवल कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करने से [मंत्र के रूप में] भौतिक अस्तित्व से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। वास्तव में, केवल हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने से [पते के रूप में] भगवान के चरण कमलों को देखने में सक्षम हो जाएगा।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)