श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 403
 
 
श्लोक  2.1.403 
এই-মতে পরিপূর্ণ বিদ্যার বিলাস
সঙ্কীর্তন-আরম্ভের হৈল প্রকাশ
एइ-मते परिपूर्ण विद्यार विलास
सङ्कीर्तन-आरम्भेर हैल प्रकाश
 
 
अनुवाद
इस प्रकार भगवान की शैक्षणिक लीला समाप्त हुई और पवित्र नामों का सामूहिक कीर्तन प्रारम्भ हुआ।
 
Thus the Lord's educational pastimes ended and the congregational chanting of the holy names began.
तात्पर्य
पवित्र नामों के सामूहिक कीर्तन के उद्घाटन के साथ ही प्रभु के शैक्षणिक लीलाओं का समापन हुआ। "संकीर्तन" शब्द से तात्पर्य है श्री हरि के नाम, रूपों, गुणों, सहयोगियों और लीलाओं का सारे मिलकर महिमामंडन करना, साथ ही साथ सेवा प्रवृत्त व्यक्तियों द्वारा ऐसे विषयों को सुनना। यह संकीर्तन की विशेषता है। जब तक कि कृष्ण के नाम, रूप, गुण, सहयोगी और लीलाओं की विधिवत महिमा नहीं की जाती है, या जब तक कि बिना किसी अपराध के महिमा नहीं की जाती है, तब तक भौतिकवादी लोगों के लिए, जो कि कृष्ण को भूले हुए हैं और अनादि काल से उनके विरोधी रहे हैं, भौतिक वस्तुओं से अपना लगाव छोड़ना संभव नहीं है। यदि आध्यात्मिक निवास के विषय या कृष्ण के अलौकिक विषय इंद्रिय-सुखों से जुड़े भौतिकवादी व्यक्तियों तक नहीं पहुँचते हैं, तो धर्म के नाम पर विभिन्न प्रकार के बने-बनाए विचार या इंद्रिय-सुख के प्रयास प्रमुख हो जाएंगे और इस तरह इस दुनिया में अव्यवस्था पैदा हो जाएगी। अपनी सर्व-शुभ, अकारण दया के प्रभाव में, सर्व-शुभ दया के सागर और सबसे अधिक उदार श्री कृष्ण चैतन्यदेव ने इस दुनिया के निवासियों की रक्षा की, जो अचैतन्य थे, आध्यात्मिक चेतना से रहित थे, अज्ञानता से उत्पन्न पदार्थ में अपने अवशोषण से; दूसरे शब्दों में, उन्होंने कृष्ण की सेवा करने की शुद्ध आध्यात्मिक प्रवृत्ति को चेतनाहीन प्राणियों और निर्जीव संस्थाओं के दिलों में जगाया, यह उपदेश देकर कि आध्यात्मिक ज्ञान की खेती करने का अंतिम परिणाम कृष्ण की सेवा के पूर्ण मंच को प्राप्त करना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)