श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 340
 
 
श्लोक  2.1.340 
যাঙ্হার চরণ সেবি’ শিব—দিগম্বর
যে-চরণ সেবিবারে লক্ষ্মীর আদর
याङ्हार चरण सेवि’ शिव—दिगम्बर
ये-चरण सेविबारे लक्ष्मीर आदर
 
 
अनुवाद
"शिव अपने चरणकमलों की सेवा करते हुए नग्न अवस्था में विचरण करते हैं। लक्ष्मी उन चरणकमलों की सेवा चाहती हैं।"
 
"Shiva wanders about naked, serving his feet. Lakshmi desires to serve those feet."
तात्पर्य
ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है:

यत् पाँदोधक आधाय शिव शिरसि नृत्यति |

यन नाली नालिनद असिद ब्रह्मा लोका पितामहः

यद्इच्छा शक्ति विक्षोभाद ब्रम्हाण्डोद्भव सन्क्षयौ |

तम आर्द्धअया गोविन्दं स्थान अग्रयं यद् इच्छति |

"यदि कोई सबसे श्रेष्ट निवास चाहता है, तो उसे श्री गोविंद के चरणों की पूजा करनी चाहिए। शिव उनके चरणों को धोने वाले पानी को अपने सिर पर रखकर परमानंद में नृत्य करते हैं, मनुष्य जाति के जनक ब्रह्मा उनके नाभिकमल से पैदा हुए हैं, और ब्रह्माण्ड का निर्माण और विनाश बस उनकी इच्छा शक्ति के उद्घाटन के परिणामस्वरूप होता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)