श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 325
 
 
श्लोक  2.1.325 
পডুযা সকলে বলে,—“ধাতু-সṁজ্ঞা কার্?”
প্রভু বলে,—“শ্রী-কৃষ্ণের শক্তি নাম যার
पडुया सकले बले,—“धातु-सꣳज्ञा कार्?”
प्रभु बले,—“श्री-कृष्णेर शक्ति नाम यार
 
 
अनुवाद
विद्यार्थियों ने पूछा, "धातु या मौखिक मूल की परिभाषा क्या है?" भगवान ने उत्तर दिया, "जिसे कृष्ण की ऊर्जा कहा जाता है।
 
The students asked, "What is the definition of dhatu or verbal root?" The Lord replied, "That which is called the energy of Krishna.
तात्पर्य
छात्रों के प्रश्नों के उत्तर में प्रभु ने कहा, "क्योंकि कृष्ण की परा (अन्तरंगा अथवा स्वरूप) शक्ति कृष्ण के औदार्य, माधुर्य और ऐश्वर्य आध्यात्मिक लीलाओं का प्रदर्शन करती है, इस प्रकार ऊर्जा और ऊर्जावान इस तरह कि एक दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। इसी तरह, जब शब्दों की व्युत्पत्ति व्याकरणिक रचना द्वारा होती है, ऐसी प्रत्येक अभिव्यंजक शब्द के मूल रूप से स्वयं के भीतर अभिव्यक्ति का एक अविभाज्य रूप से जुड़ा अर्थ या शक्ति प्रकट होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)