श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 248
 
 
श्लोक  2.1.248 
অহর্-নিশ শ্রবণে শুনযে কৃষ্ণ-নাম
বদনে বোলযে ’কৃষ্ণচন্দ্র’ অবিরাম
अहर्-निश श्रवणे शुनये कृष्ण-नाम
वदने बोलये ’कृष्णचन्द्र’ अविराम
 
 
अनुवाद
वह रात-दिन कृष्ण के नाम सुनता रहता था और निरन्तर कृष्णचन्द्र का नाम जपता रहता था।
 
He kept listening to the name of Krishna day and night and continuously chanted the name of Krishnachandra.
तात्पर्य
श्री गौरसुंदर ने महाभागवत वैष्णव की लीला दिखाई और सब कुछ कृष्ण के संदर्भ में देखने लगे। सामान्य भौतिकवादी जो कृष्ण को भूल चुके हैं, सांसारिक ज्ञान से भ्रमित हो जाते हैं, और वे सब कुछ कृष्ण के संदर्भ में देखने के बजाय, पूरी दुनिया को भोग की जगह की तरह देखते हैं। हालाँकि, महाप्रभु ने खुद को भोक्ता के रूप में पहचान कर ऐसा उदाहरण सेट नहीं किया; बल्कि, उन्होंने इस चेतन और अचेतन दुनिया को देखा, जो उन बद्ध आत्माओं के लिए दिखाई देती है जो कृष्ण से दूर और विस्मृत हैं, एक महाभागवत वैष्णव की आध्यात्मिक दृष्टि के माध्यम से जो कृष्ण की सेवा के लिए इच्छुक है। उन्होंने हर जीवित इकाई के दिल में सर्वशक्तिमान कृष्ण के मनोरंजन का एहसास करना शुरू किया। इसलिए, चूंकि हर जगह परम वैकुंठ-गोलोक को महसूस करते हुए, उनके पास भूलने वाले भौतिकवादी बद्ध आत्माओं की तरह अस्थायी भौतिक अवधारणाएँ नहीं थीं, इसलिए वे कृष्ण के भोग और सेवा की स्वीकृति के मनोरंजन को देखने से उन ऐश्वर्य बाधित नहीं कर पाए।

चैतन्य-चरितामृत (मध्य 8.274) में कहा गया है:

स्थावर-जंगम देखे, ना देखे तारा मूर्ति

सर्वत्र हय निजा इष्ट-देव-स्फूर्ति

"निश्चित रूप से महाभागवत, उन्नत भक्त, हर चीज को स्थिर और अस्थिर देखता है, लेकिन वह बिल्कुल उनके रूप नहीं देखता है। बल्कि, हर जगह वह तुरंत परम भगवान के रूप को प्रकट होते देखता है।"

श्रीमद भागवतम (11.2.45, 49-54) में श्री हवि, नौ योगेंद्रों में से एक, विदेह के राजा निमि से इस प्रकार कहते हैं:

श्री-हविर उवाच

सर्व-भूतेषु यः पश्येद

भगवद्-भावं आत्मनः

भूतानि भगवत्य आत्मनि

एष भागवतोत्तमः

"सबसे उन्नत भक्त हर चीज में सभी आत्माओं की आत्मा, भगवान श्री कृष्ण को देखता है। परिणामस्वरूप, वह सब कुछ परम भगवान के संदर्भ में देखता है और समझता है कि जो कुछ भी मौजूद है वह परम भगवान में शाश्वत रूप से स्थित है।

देहेंद्रिय-प्राण-मनो-धियाम् यो

जन्मापय-क्षुद्-भय-तर्ष-कृच्छ्रैः

संसार-धर्मैर अविमुह्यमानः

स्मृत्या हरर भागवत-प्रधानः

"भौतिक दुनिया में, किसी का भौतिक शरीर हमेशा जन्म और क्षय के अधीन होता है। इसी तरह, जीवन वायु [प्राण] भूख और प्यास से परेशान है, मन हमेशा चिंतित रहता है, बुद्धि जो प्राप्त नहीं की जा सकती उसके लिए तड़पती है, और सभी इंद्रियां अंततः भौतिक प्रकृति में निरंतर संघर्ष से थक जाती हैं। एक व्यक्ति जो भौतिक अस्तित्व के अपरिहार्य दुखों से विचलित नहीं होता है, और भगवान श्री हरि के चरण कमलों का स्मरण करके उनसे दूर रहता है, उसे भागवत-प्रधान, भगवान का सर्वोपरि भक्त माना जाना चाहिए।

न काम-कर्म-बीजानम

यस्य चेतसि संभवः

वासुदेवैक-निलयः

स वै भागवतोत्तमः

"जिसने भगवान वासुदेव, सर्वोच्च भगवान की शरण ली है, वह फलदायी गतिविधियों से मुक्त हो जाता है, जो भौतिक वासना पर आधारित हैं। वास्तव में, जिसने भगवान के चरण कमलों की शरण ली है, वह भौतिक इंद्रिय संतुष्टि का आनंद लेने की इच्छा से भी मुक्त हो जाता है। यौन जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और धन का आनंद लेने की योजना उसके दिमाग में विकसित नहीं हो सकती है। इस प्रकार उसे भागवत-उत्तम माना जाता है, जो सर्वोच्च स्तर पर भगवान का एक शुद्ध भक्त है।

न यस्य जन्म-कर्मभ्यः

न वर्णाश्रम-जतिभिः

सज्जते 'स्मिन अहम-भावो

देहे वै स हरिः प्रियः

"एक कुलीन परिवार में जन्म और तपस्वी और पवित्र कार्यों का निष्पादन निश्चित रूप से किसी को अपने आप पर गर्व करता है। इसी तरह, यदि कोई समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान का आनंद लेता है क्योंकि उसके माता-पिता वर्णाश्रम सामाजिक प्रणाली के अत्यधिक सम्मानित सदस्य हैं, तो वह अपने आप में और भी अधिक आसक्त हो जाता है। लेकिन अगर इन उत्कृष्ट भौतिक योग्यताओं के बावजूद भी व्यक्ति खुद में गर्व की भावना का एहसास नहीं करता है, तो उसे भगवान श्री हरि का सबसे प्रिय सेवक माना जाता है।

न यस्य स्वः पर इति

वित्तेष्व आत्मनि वा भिदा

सर्व-भूत-समः शांतः

स वै भागवतोत्तमः

"जब कोई भक्त स्वार्थपूर्ण अवधारणा को त्याग देता है जिसके द्वारा कोई सोचता है 'यह मेरी संपत्ति है, और वह उसकी है', और जब वह अब अपने भौतिक शरीर के सुखों से संबंधित नहीं रह जाता है या दूसरों की तकलीफ़ों के प्रति उदासीन रहता है, तो वह पूरी तरह से शांत और संतुष्ट हो जाता है। वह खुद को केवल सभी जीवों में से एक मानता है जो समान रूप से भगवान के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग हैं। ऐसे संतुष्ट वैष्णव को भक्ति सेवा के उच्चतम मानक पर माना जाता है।

त्रि-भुवन-विभव-हेतवे 'प्यकुंठ-

स्मृतिरजितात्म-सुरादिभिरविमृग्यात्

न चलति भगवत्-पादारविन्दाल

लवा-निमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः

"भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के चरण कमलों को सबसे बड़े देवताओं द्वारा भी मांगा जाता है, जैसे ब्रह्मा और शिव, जिन्होंने सभी ने भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को अपने जीवन और आत्मा के रूप में स्वीकार किया है। भगवान का एक शुद्ध भक्त किसी भी परिस्थिति में उन कमल चरणों को कभी नहीं भूल सकता। वह एक पल के लिए भी, वास्तव में, आधे पल के लिए भी, भगवान के चरण कमलों में अपने आश्रय को नहीं छोड़ेगा - वास्तव में, पूरे ब्रह्मांड के वैभव का आनंद लेने और शासन करने के आशीर्वाद के बदले में भी नहीं। भगवान का ऐसा भक्त वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

भगवता उरु-विक्रमांघ्रि-शाखा-

नखा-मणि-चंद्रिकया निरस्त-तापे

हृदि कथमुपसीदतां पुनः स

प्रभवति चंद्रो वोदिते 'र्क-तापः

"भौतिक दुख की आग उन लोगों के दिलों को कैसे जला सकती है जो भगवान की पूजा करते हैं? भगवान के चरण कमलों ने असंख्य वीरतापूर्ण कार्य किए हैं, और उनके पैरों के अंगूठे पर सुंदर नाखून मूल्यवान गहनों से मिलते जुलते हैं। उन नाखूनों से निकलने वाली चमक ठंडी चांदनी की तरह होती है, क्योंकि यह शुद्ध भक्त के हृदय के भीतर की पीड़ा को तुरंत दूर करती है, जैसे चंद्रमा की ठंडी रोशनी सूर्य की जलती गर्मी को दूर करती है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)