श्रीमद् भागवतम् (11.5.3) में, नव-योगेंद्रों में से एक, श्री चमास मुनि, विदेह के राजा निमि से इस प्रकार कहते हैं:
य एषां पुरुषं साक्षाद ात्म-प्रभवम ईश्वरम्
न भजन्त्य अवजानन्ति स्थानाद भ्रष्टाः पतन्त्य अधः
"यदि चारों वर्ण और चार आश्रमों में से कोई भी सदस्य भगवान की पूजा करने में विफल रहता है या जानबूझकर उनकी अवमानना करता है, जो उनकी अपनी रचना के स्रोत हैं, तो वे अपनी स्थिति से गिरकर नारकीय जीवन अवस्था में पहुँच जाएँगे।"
