श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.1.202 
জগতের পিতাকৃষ্ণ, যে না ভজে বাপ
পিতৃ-দ্রোহী পাতকীর জন্ম-জন্ম তাপ
जगतेर पिताकृष्ण, ये ना भजे बाप
पितृ-द्रोही पातकीर जन्म-जन्म ताप
 
 
अनुवाद
कृष्ण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पिता हैं और जो कोई अपने पिता का सम्मान नहीं करता, वह विद्रोही और पापी है और इसलिए जन्म-जन्मान्तर तक दुःख भोगता है।
 
Krishna is the father of the entire universe and anyone who does not respect his father is rebellious and sinful and hence suffers from birth to birth.
तात्पर्य
जीवित संस्थाओं का चेतन संसार और पदार्थ का निर्जीव संसार दोनों ही कृष्ण से उत्पन्न हुए हैं। इसलिए कृष्ण पूरे संसार के एकमात्र पिता हैं। जिस तरह एक कृतज्ञ पुत्र का प्रधान कर्तव्य अपने पिता की सेवा और अनुसरण करना है, उसी तरह प्रत्येक जीवित प्राणी, विशेषकर मानव प्राणी को यह समझना चाहिए कि कृष्ण के चरण कमल संपूर्ण सृष्टि के मूल स्रोत हैं; दूसरे शब्दों में, वे सब कुछ के स्रोत हैं और सभी के द्वारा हमेशा पूजे जाने के लिए हैं। वे जीव जो आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान के ज्ञान से वंचित हैं और कृष्ण, जो मूल नारायण हैं और कमल-जन्मे ब्रह्मा के पिता हैं, की भक्ति-सेवा से रहित हैं, वे वास्तव में कृतघ्न संतान हैं और इसलिए भौतिक अस्तित्व के कष्टों के अधीन हैं। इस दुनिया में तीन प्रकार के कष्ट- अध्यात्मिक, अधिभौतिक और अधिदैविक (शरीर और मन से उत्पन्न कष्ट, अन्य जीवों द्वारा उत्पन्न कष्ट और प्राकृतिक अशांति से उत्पन्न कष्ट) ऐसे कृतघ्न अपमानजनक पुत्रों के लाभ के लिए व्यवस्थित किए गए हैं जो धर्म के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।

श्रीमद् भागवतम् (11.5.3) में, नव-योगेंद्रों में से एक, श्री चमास मुनि, विदेह के राजा निमि से इस प्रकार कहते हैं:

य एषां पुरुषं साक्षाद ात्म-प्रभवम ईश्वरम्

न भजन्त्य अवजानन्ति स्थानाद भ्रष्टाः पतन्त्य अधः

"यदि चारों वर्ण और चार आश्रमों में से कोई भी सदस्य भगवान की पूजा करने में विफल रहता है या जानबूझकर उनकी अवमानना करता है, जो उनकी अपनी रचना के स्रोत हैं, तो वे अपनी स्थिति से गिरकर नारकीय जीवन अवस्था में पहुँच जाएँगे।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)