श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.1.190 
বিশ্বক্সেনেরে তবে করি’ নিবেদন
অনন্ত-ব্রহ্মাণ্ড-নাথ করেন ভোজন
विश्वक्सेनेरे तबे करि’ निवेदन
अनन्त-ब्रह्माण्ड-नाथ करेन भोजन
 
 
अनुवाद
असंख्य ब्रह्माण्डों के स्वामी विश्वक्सेन को भोजन कराकर स्वयं भोजन करने लगे।
 
After feeding Vishvaksena, the lord of countless universes, he himself started eating.
तात्पर्य
विश्वक्सेन या विस्वक्सेन, भगवान विष्णु के चार भुजाओं वाले सहयोगी हैं जो भगवान की मालाएँ धारण करते हैं। हरि-भक्ति-विलास (8.84-87) में कहा गया है: "इसके बाद एक संयमी व्यक्ति को प्रभु का सौवां भाग प्रसाद विस्वक्सेना को अर्पित करना चाहिए।" और श्रीमद् भागवतम (11.27.29, 43) में कहा गया है: "प्रोक्षन जैसे प्रसादों के साथ दुर्गा, विनायक, व्यास, विस्वक्सेना, आध्यात्मिक गुरुओं और विभिन्न देवताओं की पूजा करनी चाहिए। ये सभी व्यक्तियों को देवता के सामने अपने उचित स्थानों पर होना चाहिए। एक बार फिर उन्हें अपने मुंह को धोने के लिए जल देवता को अर्पित करना चाहिए, और उन्हें विस्वक्सेना को भगवान के भोजन के अवशेष देने चाहिए।" उत्तरार्ध के उद्धृत छंद पर अपनी भावार्थ-दीपिका टीका में, श्रीधर स्वामीपाद ने कहा है: "किसी को ध्यान करना चाहिए कि भगवान ने खाना समाप्त कर दिया है और फिर उन्हें अपने हाथ और मुंह धोने के लिए पानी देना चाहिए। इसके बाद भगवान के खाद्य पदार्थों के अवशेषों को विस्वक्सेना को अर्पित करना चाहिए, और उनकी अनुमति लेने के बाद ही कोई खा सकता है।" यह शास्त्र का निषेधाज्ञा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)