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श्लोक 2.1.127  |
গোষ্ঠী-সঙ্গে মুকুন্দ-সঞ্জয পুণ্যবন্ত
যে হৈল আনন্দ, তাহার নাহি অন্ত |
गोष्ठी-सङ्गे मुकुन्द-सञ्जय पुण्यवन्त
ये हैल आनन्द, ताहार नाहि अन्त |
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| अनुवाद |
| अपने सम्बन्धियों के साथ परम धर्मात्मा मुकुन्द संजय को असीम सुख का अनुभव हुआ। |
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| The most pious Mukunda Sanjaya experienced immense happiness with his relatives. |
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