बालु गडि याय दुइ-प्रभु प्रेम-रसे हुङ्कार करये कृष्ण-प्रेमेर आवेशे
दोनों प्रभु शब्द श्रीमद नित्यानंद प्रभु और श्रीपाद माधवेंद्र पुरी को दर्शाता है।