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श्लोक 1.8.77  |
দেখিতে দেখিতে জগন্নাথ পুত্র-মুখ
নিতি-নিতি পায অনির্বচনীয সুখ |
देखिते देखिते जगन्नाथ पुत्र-मुख
निति-निति पाय अनिर्वचनीय सुख |
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| अनुवाद |
| प्रतिदिन जगन्नाथ मिश्र को अपने पुत्र का चेहरा देखकर अवर्णनीय खुशी का अनुभव होता था। |
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| Every day Jagannath Mishra felt indescribable happiness seeing his son's face. |
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