श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 8: जगन्नाथ मिश्र का तिरोभाव  »  श्लोक 149-150
 
 
श्लोक  1.8.149-150 
অনন্তের শ্রী-বিগ্রহে যাঙ্হার শযন
লক্ষ্মী যাঙ্’র পাদ-পদ্ম সেবে অনুক্ষণ
চারি-বেদে যে প্রভুরে করে অন্বেষণে
সে প্রভু যাযেন নিদ্রা শচীর অঙ্গনে
अनन्तेर श्री-विग्रहे याङ्हार शयन
लक्ष्मी याङ्’र पाद-पद्म सेवे अनुक्षण
चारि-वेदे ये प्रभुरे करे अन्वेषणे
से प्रभु यायेन निद्रा शचीर अङ्गने
 
 
अनुवाद
जो अनन्त के शरीर पर शयन करते हैं, जिनके चरणकमलों की सेवा लक्ष्मीजी निरन्तर करती हैं, जो वेदों से जानने योग्य हैं, वही भगवान् इस समय शची के आँगन में शयन कर रहे थे।
 
The Lord who sleeps on the body of Anant, whose lotus feet are constantly served by Goddess Lakshmi, who is knowable from the Vedas, was at this time sleeping in the courtyard of Sachi.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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