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श्लोक 1.7.64  |
মনে মনে চিন্তযে অদ্বৈত মহাশয
“প্রাকৃত মানুষ কভু এ বালক নয” |
मने मने चिन्तये अद्वैत महाशय
“प्राकृत मानुष कभु ए बालक नय” |
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| अनुवाद |
| श्री अद्वैत प्रभु ने मन ही मन सोचा, “यह लड़का कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।” |
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| Sri Advaita Prabhu thought to himself, “This boy is no ordinary person.” |
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