श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  1.7.175 
আমার সে কাল্পনিক ’শুচি’ বা ’অশুচি’
স্রষ্টার কি দোষ আছে, মনে ভাব বুঝি’
आमार से काल्पनिक ’शुचि’ वा ’अशुचि’
स्रष्टार कि दोष आछे, मने भाव बुझि’
 
 
अनुवाद
"पवित्रता और अपवित्रता तो हमारी मानसिक रचना मात्र है। कृपया विचार करें, इसमें रचयिता का क्या दोष है?"
 
"Purity and impurity are merely our mental creations. Please think, what is the fault of the creator in this?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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