श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  1.7.114 
নিরবধি থাকে পিতা-মাতার সমীপে
দুঃখ পাসরযে যেন জননী-জনকে
निरवधि थाके पिता-मातार समीपे
दुःख पासरये येन जननी-जनके
 
 
अनुवाद
वह सदैव अपने माता-पिता के पास रहते थे ताकि उन्हें अपने कष्टों से कुछ राहत मिल सके।
 
He always stayed with his parents so that they could get some relief from their sufferings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)