भक्ति सेवा के बिना कोई भी भगवान चैतन्य को नहीं समझ सकता, जिनके रोम छिद्रों से असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं।
Without devotional service no one can understand Lord Chaitanya, from whose pores arise innumerable universes.
तात्पर्य
शब्द 'नाहि जाणि' का अर्थ अज्ञात (न पता होना) और 'गणि' का अर्थ गिना हुआ है। भगवान श्री चैतन्यदेव की भक्ति कभी भी भौतिक प्राणी के भौतिक प्रयासों से उद्बुद्ध नहीं होती। केवल वे ही जो अपनी भक्ति भावना को जगाए हुए हैं, जो कि आत्मा की गतिविधि है, वे ही श्री चैतन्यदेव को समझ सकते हैं। यह एक विख्यात तथ्य है कि अनगिनत ब्रह्मांड श्री चैतन्य-नारायण के रोम-छिद्रों में विराजमान हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥