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श्लोक 1.6.113  |
লিখন-কালির বিন্দু শোভে গৌর অঙ্গে
চম্পকে লাগিল যেন চারি-দিকে ভৃঙ্গে |
लिखन-कालिर बिन्दु शोभे गौर अङ्गे
चम्पके लागिल येन चारि-दिके भृङ्गे |
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| अनुवाद |
| स्याही की बूँदें भगवान के सुनहरे अंगों को सुशोभित कर रही थीं और ऐसा लग रहा था जैसे चम्पक पुष्प के चारों ओर भौंरे हों। |
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| Drops of ink were adorning the golden body of the Lord and it looked as if there were bees around the Champaka flower. |
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