श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 6: भगवान की शिक्षा की शुरुआत और बचपन की शरारत  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  1.6.105 
সে হেন নন্দন যা’র গৃহ-মাঝে থাকে
কি করিতে পারে তা’রে ক্ষুধা-তৃষা-শোকে?
से हेन नन्दन या’र गृह-माझे थाके
कि करिते पारे ता’रे क्षुधा-तृषा-शोके?
 
 
अनुवाद
“जिसके घर में ऐसा पुत्र हो, उसे भूख, प्यास या विलाप का अनुभव कैसे हो सकता है?
 
“How can one who has such a son in his house experience hunger, thirst or lamentation?
तात्पर्य
तृष्णा शब्द का अर्थ है "प्यास"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)